अब आगे............अधिराज वैदेही को उठाने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसकी सारी कोशिश बेकार हो रही थी तभी उसी नजर वैदेही के पैरों पर पड़ती है जहां सर्प दंश का निशान था , बिना देर किए अधिराज अपने पंखों को फैलाते हुए वैदेही अपनी बाहों में भर कर पंचमढ़ी की तरफ उड़ जाता है..."अधिराज अधिराज " किसी की घबराई हुई आवाज से अधिराज अपने ख्यालों से बाहर आते हुए कहता है...." क्या हुआ शशांक..?... तुम इतने घबराए हुए क्यूं हो..?.."शशांक चिंता भरी आवाज में कहता है..." अधिराज तुम यहां अपने स्मृति में ही वैदेही को पा लोगे क्या..."" क्या