मुलाक़ात - एक अनकही दास्तान - 4

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संयोगिता के जाने के बाद आदित्य के मन में एक बेचैनी घर कर गई। वह जानता था कि उसकी आँखों में जो दर्द था, वह कोई साधारण चिंता नहीं थी—वह किसी गहरे ज़ख्म की परछाई थी।वह पूरी रात सो नहीं पाया। उसकी आँखों के सामने बार-बार संयोगिता का चेहरा आ जाता, उसकी आवाज़ कानों में गूंजती—"कभी-कभी कुछ कहानियाँ पूरी नहीं होतीं।"लेकिन क्यों?सुबह की हल्की धूप जब खिड़की से अंदर आई, तो आदित्य की बेचैनी और भी बढ़ गई। कमरे की सफेद दीवारें अब उसे एक बंद दायरे की तरह महसूस हो रही थीं। वह जानता था कि जब तक संयोगिता