काली किताब - 7

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वरुण के हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और काली किताब के पास पहुँचा। जैसे ही उसने उसे छूने की कोशिश की, एक ज़ोरदार झटका लगा और उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। जब उसने आँखें खोलीं, तो वह किसी और ही जगह पर था। यह हवेली का कोई पुराना कक्ष था, जहाँ दीवारों पर जली हुई तस्वीरें टंगी थीं और फर्श पर धूल की मोटी परत जमी थी।  एक परछाईं सामने उभरी—वही आत्मा। लेकिन अब उसके चेहरे पर गहरी पीड़ा के निशान थे। उसने धीमे स्वर में कहा, "वरुण, मैं तुम्हें सब