कमरा अंधेरे में डूबा था। खिड़की से आती हल्की चांदनी बस इतनी थी कि चीज़ों के धुंधले साए दिख जाएं। हर्षवर्धन ने टीवी की आवाज़ और तेज़ कर दी थी, लेकिन उसकी आँखों के सामने सिर्फ़ एक ही चेहरा था—सनजना का।वो बंद कमरे के अंदर रोते-रोते चुप हो गई थी। ठंड से कांपते हुए उसने खुद को समेट लिया। आँखों में आंसू थे, लेकिन दिमाग में सिर्फ़ सवाल। "आखिर ये शख्स मुझसे इतनी नफरत क्यों करता है?"उधर हर्षवर्धन की मुट्ठियां कस गई थीं। उसने आंखें बंद कीं और लंबी सांस ली।"तुम मेरी ज़िंदगी में आ ही क्यों गई, सनजना?"वो खुद