(भाग -11) वर्तमान अंक की सारी पत्रिकाएं डिस्पैच हो चुकी हैं। अब रुकने का कोई कारण नहीं था। वैसे भी मुझे यह शहर काटने को दौड़ता है, जिधर भी आता हूं भागते वाहन उनमें भरे हुए लोग...। पता नहीं यह भीड़ कहां भागी जा रही है? कहां से आ रही है! और इस भीड़ में कोई अपना नहीं। जो एक अपना दिखा उसे भी मैंने खो दिया। अगर मैं अपने आप को रोक पाता तो यह नौबत नहीं आती। क्या उससे आंख भी मिला पाऊंगा, अब! बहुत मायूस और निराश-हताश-सा पड़ा रहा देर तलक। सोचता-पछ्ताता कि वह घटना नहीं घटाता