शून्य से शून्य तक - भाग 75

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75===  जीवन चलने का नाम ही तो है लेकिन आशी ने तो जीवन को अपने अनुसार बाँधना चाहा था| जब तक भावना के साथ बहता रहे तब तक इंसान की ज़िंदगी में हलचल और रौनक रहती है| यह सब प्रेम व समर्पण से ही तो संभव है लेकिन कहाँ समझ पाई वह! या कह लीजिए उसने समझना नहीं चाहा फिर बाद में क्यों?क्यों छलकने लगा प्रेम उसके मन में, प्राणों में, धड़कन में ?     कलम की गति आशी से न जाने क्या-क्या लिखवा रही थी और वह जैसे किसी के बस में थी| उसे पता चल चुका था कि