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Virendr

Virendr

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कल तलक जो हमारे थे अपने सभी,
आज हम से भी वह खफा हो गए ।

महफिलें उजड़ी सूनी गलियां हुई,
जब अपने ही दर से दफा हो गए ॥
- Virendr

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मत पूंछ मेरे सब्र की इंतेहा कहां तक है,
तू सितम करले तेरी ताकत जहां तक है।
वफा की उम्मीद जिन्हे होगी, उन्हे होगी,
हमें तो देखना है तू जालिम कहां तक है॥
-वीरेंद्र

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