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Nivedita Srivastava

Nivedita Srivastava

@niveditasrivastava2319


सफ़र ज़िन्दगी का ...

गुनगुनाती रही रात भर मैं गज़ल।
साथ तुम भी कभी गुनगुनाया करो।।

मुस्कराते रहे चश्मे नम शब भर
हो सके कभी सच भी बताया करो

सारे' सपने सच खिल ही जायें'गे
सच कभी बन तुम जगमगाया करो

सच कहो साथ कभी इतना दुश्वार नहीं
भाव जो मन बसे ना छुपाया करो

सफ़र ज़िन्दगी का है मुश्किल मगर
दो कदम साथ 'निवी' निभाया करो
..... निवेदिता श्रीवास्तव निवी'

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#काव्योत्सव

जीवन की आपाधापी में........

जीवन की आपाधापी में
जीवन के ताने बाने में ,
मैं प्यार निभाती ही रही
प्यार दिखा न पाई !
दायित्वों के तले
कर्म करती ही रही ,
मुस्कान बिखेरती ही रही
मुस्करा न सकी !
तुम को सुलाने में
ख़ुद मैं कभी सो न पाई,
तुम्हे लिख़ना सिखाने में
ख़ुद लिखना भूल गई!
अब इस सान्ध्यकाल जो देख़ा ,
कुछ भी न मैंने ख़ोया है !
देख़ मेरे चेहरे की हल्की शिकन ,
तुम भूल जाते हो मुस्कराना
मेरे हल्की सी लड़खड़ाहट पर ,
दौड़ आते हो थामने मुझ को
मेरे आवाज़ की उदासी ,
कैसे महसूस कर जाते हो
कैसे कहूँ मैंने कुछ ख़ोया ,
सारा जग तुमने तो दे डाला
ये सुक़ून भरी नींद ,
उन जागी रातों पर वारी हैं
मेरे चाँद -सूरज ,
मेरी दुनिया के सितारों
तुम्हारी मीठी रौशनी ,
सच यही तो मेरे मन-आंगन
में महकती-खिलखिलाती चमक है ... निवेदिता

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#काव्योत्सव

हो गयी हूँ चुप पर गीत अभी बाकी है
थक गयी हूँ बहुत सफर अभी बाकी है

तीर तलवार के वार बहुत किये तुमने
बेजुबानी की चुप्पी अनदेखा किये तुमने

उठ सकती है झुकी ये निगाहें मेरी
जिंदगी की है अब ये पतवार मेरी

शब्दों को डुबो तो दूँ मंझदार में
बेख्याली के इस दीन ओ दीदार में

चंद साँसों की कर्जदारी अभी बाकी है
खामोश शब्दों का उधार अभी बाकी है .... निवेदिता

#काव्योत्सव

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#काव्योत्सव

आज कुछ अलग सा है जाम बनाया

ये आसमान से बरसता अमृत
दिल का छलकता सागर बनाया
यादों के कतरे बर्फ से
आँखों से नमक मिलाया

तुमने थामी है जो वक्त की प्याली
कुछ खारी है कुछ है बावली
छन्न से खनकी जो बर्फ की फुहार
खुशियों के भी हैं कुछ सवाली

जाम में चन्द बूंदे मय की
बाकी भरी है धार बरसात की
चल पड़े दो चार कदम
बेजुबान है जुबाँ प्यार की .... निवेदिता
#काव्योत्सव

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#काव्योत्सव
विषय : #अध्यात्म

अन्तिम यात्रा के साज श्रॄंगार..............

यात्रा कोई सी हो
या कहीं की भी हो
करनी ही पड़ जाती है
तैयारियाँ बहुत सारी !

जब छोटे थे खिलौने
सम्हालते ,थोड़े बड़े हुए
तो थामा किताबों का हाथ
बस यूँ ही बदलते रहे
यात्रा के सरंजाम .....

अब जब अंतिम यात्रा की ,
करनी है तैयारी ,विचारों ने
उठाया संशय का बवंडर !

सबसे पहले सोचा ,ये
अर्थी के लिए सीढ़ी
या कहूँ बाँस की टिकटी,
ये ही क्यों चाहिए .......

शायद इस जहाँ से
उस जहाँ तक की
दूरी है कुछ ज्यादा ...
क़दमों में ताकत भी
कम ही बची होगी
परम सत्ता से मिलने को
सत्कर्मों की सीढ़ी
की जरूरत भी होगी !

ये बेदाग़ सा कफ़न
क्या इसलिए कि
सारा कलुष ,सारा विद्वेष
यहीं छूट जाए ,साथ हो
बस मन-प्राण निर्मल
फूलों के श्रृंगार में
सुवासित हो सोलह श्रृंगार !

अँधेरे पथ में राह दिखाने
आगे-आगे बढ़ चले
ले अग्नि का सुगन्धित पात्र !
परम-धाम आ जाने पर
अंतिम स्नान क़रा
अंतिम-यात्रा की ,अंतिम
धूल भी साफ़ कर दी !

सूर्य के अवसान से पहले
अग्नि-दान और कपाल-क्रिया
भी जल्दी कर ,लौट जाना
निभाने दुनिया के दस्तूर !

मैं तो उड़ चलूंगी धुंएँ के
बादल पर सवार ,पीछे
छोड़ अनगिनत यादें ....

आज से सजाती हूँ ,
अपनी बकुचिया ,तुम तो
सामान की तलाश में
हो जाओगे परेशान ....

चलो ,जाते-जाते इतना सा
साथ और निभा जाऊँ
अपनी अंतिम पोटली बना
अपना जाना कुछ तो
सहज बना जाऊँ ...... निवेदिता

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*पहाड़ भी मरते हैं*

आप गए तब सोचती रह गयी
एक चट्टान ही तो दरकी रिश्तों की
अब देखती हूँ
वो सिर्फ एक चट्टान नहीं थी
वो तो एक सिलसिला सा बन गया
दरकती ढहती चट्टानों का

आप का होना नहीं था
सिर्फ एक दृढ़ चट्टान का होना
आप तो थे एक मेड़ की तरह
बाँधे रखा था छोटी बड़ी चट्टानों को
नहीं ये भी नहीं ....

आप का होना था
एक बाँध सरीखा
आड़ी तिरछी शांत चंचल फुहारों को
समेट कर दिशा दे दशा निर्धारित करते
उर्जवित करते निष्प्राण विचारों को

एक चट्टान के हटते ही
बिखर गया दुष्कर पहाड़
मैं बस यही कहती रह गयी
सच मैं देखती रह गयी
पहाड़ को भी यूँ टूक टूक मरते ... निवेदिता

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लघुकथा : अस्तित्व की पहचान

अन्विता अर्चिका को देखते ही स्तब्ध रह गयी ,"अरे ... ये तुझे क्या हुआ ... कैसी शकल बना रखी है ..."

अन्विता जैसे अपनी सखी के मन मे विराजमान शून्य तक पहुँच गयी हो ,उसको साहस देते हाथों से थाम लिया ,"जानती है अर्चिका असफलता या अस्तित्व को नकारे जाने से निराश होकर जीवन से हार मान लेने से किसी समस्या का समाधान नहीं मिल सकता । तुम्हारी ये स्थिति किस वजह से है ये मैं नहीं पूछूँगी सिर्फ इतना ही कहूँगी कि तुम्हारा होना किसी की स्वीकृति का मोहताज नहीं है । हो सकता है कि तुमको लग रहा होगा कि इतनी बड़ी दुनिया मे तुम्हारा अस्तित्व ही क्या है । सच्चाई तो ये है कि हर व्यक्ति की कुछ विशिष्ट पहचान न होते है भी विशिष्ट अस्तित्व होता है । तुम पूरी दुनिया तो नहीं बन सकती पर ये भी सच है कि तुम्हारे बिना ये दुनिया भी अधूरी रहेगी । लहरों में उफान सिर्फ एक बूंद पानी से नहीं आ सकता पर उस जैसी कई नन्ही बूँदों का सम्मिलित आवेग ही तो तूफानी हो जाता है । अपनेआप को और अपनी महत्ता सबसे पहले खुद के लिये पहचानो ,फिर देखो तुममे कमी निकालनेवाले स्वर ही तुम्हारी वंदना करते हुए अनुगमन करेंगे ।"

खिड़की से झाँकते इंद्रधनुषी रंगों की चमक जैसे अर्चिका की आँखों में सज गयी ! ... निवेदिता

#moralstories

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लघुकथा : दूसरा अवसर

अन्विता ,"माँ ये सब समान फेंक दूँ क्या सारा खराब और टूटा फूटा है ... "

माँ ,"नहीं बेटा सब ठीक हो जायेगा ... ये इस चप्पल में दूसरा बंध डलवा देंगे ,तब घर मे पहनने के काम आ जायेगी । पैन का हैंडल ही तो टूटा है ,कपड़े से पकड़ कर काम आएगा । अरे ये साड़ी तो मेरी माँ ने दी थी फट गई तो क्या हुआ ,उससे कुछ और बना लेंगे । अन्विता बेटा गृहस्थी सब समझ कर चलानी पड़ती है ,ऐसे ही कुछ भी फेंका नहीं जाता ।"

अन्विता ,"माँ यही तो मैं भी कहना चाहती हूँ ... भइया का शरीर शांत हुआ और भाभी को जीते जी ही मरना पड़ रहा है । जब इन निर्जीव वस्तुओं को फिर से उपयोगी बना सकती हैं आप तब जीती जागती भाभी को जीवन जीने का दूसरा अवसर क्यों नहीं मिल रहा ? माँ आप भाभी की शिक्षा पूरी करवाइए और उनकी पसंद का रंग उनके जीवन में फिर से भर दीजिये ।"
..... निवेदिता

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