Quotes by Dilip Koshti in Bitesapp read free

Dilip Koshti

Dilip Koshti

@dpkoshtigmailcom


#Kavyotsav2
एक कविता किसी दोस्त के नाम...

चल पड़ी है आजकल वो झोला उठाकर सवेरे सवेरे
कभी चेहरा देखकर हँसती है,कभी रोती है ।

नजाने कितने ख्वाब दबे हैं दिल में,
सच होने की ख्वाहिश में,
कभी चिल्लाती है कभी खामोश रहती है ।

आज भी मेट्रो व बस की दौड़भाग है, कल भी थी,
फर्क इतना है, पहले बोझ बदन पर था, आज जेहम में है ।

हो जाती है कभी रूबरू अकेले में अपने आपसे,
तो कभी दोस्तो को याद कर खिलखिलाती है
डूब जाती है अक्सर बीते अतीत में,
बिना सफर के कोसों दूर हो जाती है,
अनजान बनती है कभी कुछ चेहरों से,
तो कभी खुद का परिचय ढूंढती है ।

उड़ना चाहती है वो खुले आसमान में,
बाजुओं की मज़बूरी बयां नही कर पाती,
लगी रहती है हाथों की लकीरें बदलने की कशमकश में,
कभी बिलखती है अकेले में तो कभी खुलेआम गुनगुनाती है ।

चल पड़ी है आजकल वो झोला उठाकर सवेरे सवेरे,
कभी चेहरा देखकर हस्ती है, कभी रोती है ।

Read More