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Mr.Nakul

Mr.Nakul

@anujkumar3522


काफ़ि शाम है हुई
सभी तारे बिखर गए
जहाँ यादें तेरी रखी
भटक भी हम ऊधर गए।

क्यूँ होती हुई उस भोर में तुम दोपहर बनकर आती हो ?
क्यूँ चढ़ती हुई उस दोपहर में तुम शाम बनकर आती हो ?
क्यूँ ढलती हुई उस शाम में तुम रात बनकर आती हो ?
क्यूँ हरबार अंत नही तुम मर्यादा बनकर आती हो ?
क्यूँ हरबार जिंदगी में तुम नयी आगाज़ बनकर आती हो?

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काफ़ि शाम है हुई
सभी तारे बिखर गए
जहाँ यादें तेरी रखी
भटक भी हम ऊधर गए ।

सावन की पतज़ड