उसने सुबह सिर्फ इतना लिखा, आज 5 बजे, वहीं मिलते हैं।
कोई इमोजी नहीं, कोई 'जान' नहीं, कोई फालतू डॉट भी नहीं। तीन साल में पहली बार उसका मैसेज इतना खाली लगा। मैं काफी देर स्क्रीन देखता रहा। फिर बस 'ठीक है' टाइप करके भेज दिया। उसी पल समझ आ गया था, आज आखिरी बार है।
हमारा प्यार फिल्मों जैसा नहीं था। न पहली नजर वाला ड्रामा, न बारिश में भीगना। मथुरा की कोचिंग वाली गली में शुरू हुआ था, जहाँ दस रुपये की कुल्हड़ चाय मिलती थी और समोसे अखबार के टुकड़े पर रखकर दिए जाते थे। वो मैथ्स के नोट्स मांगने आई थी। मैंने जानबूझकर पहला पेज फाड़कर दिया था ताकि अगले दिन उसे फिर आना पड़े।
वहीं से सब बना। सुबह 11:11 पर विश करना, एक ईयरफोन शेयर करना, उसकी स्कूटी पर पीछे बैठकर बैग पकड़ना ताकि ब्रेक लगे तो मैं गिरूं नहीं। वो वाला प्यार, जिसमें बड़े वादे नहीं होते। छोटे छोटे हिसाब होते हैं। तुमने मेरी चाय में चीनी कम क्यों की। तुमने मेरा नंबर Battery Low नाम से क्यों सेव किया है।
हम लड़ते भी इन्हीं बातों पर थे। वो कहती, तुम हमेशा लेट आते हो। मैं कहता, तुम हर बात को ज्यादा सोचती हो। फिर उसी ज्यादा सोचने वाली रात को दो बजे तक फोन पर बात होती और सुबह क्लास में आंखें लाल रहतीं।
पिछले छह महीने से सब धीरे धीरे बदल रहा था। उसके घर में बात खुल गई थी। किसी रिश्तेदार ने हमारी फोटो देख ली थी। मेरे पास तब एक प्राइवेट स्कूल की अस्थायी नौकरी थी और एक सरकारी परीक्षा की तैयारी जो तीसरी बार भी अटकी हुई थी। उसके पापा ने कानपुर में एक लड़का देख लिया था। बैंक में नौकरी, अपना घर।
हमने कोशिश की थी। सच में। मैंने कहा था, मुझे एक साल दे दो, मैं कुछ बन जाऊंगा। उसने कहा था, मैं घर पर बात करूंगी। पर बात करना अकेले नहीं होता। हर शाम वो घर जाती तो उसकी माँ रोती। हर सुबह मैं फोन करता तो वो कहती, रात भर सो नहीं पाई। धीरे धीरे हमारा प्यार अपराधबोध जैसा लगने लगा था।
एक दिन उसने थके हुए स्वर में कहा, हम एक दूसरे को थका रहे हैं। मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि वो सच था।
इसलिए आज पांच बजे। वहीं। मतलब रेलवे क्रॉसिंग वाले चाय के खोखे पर, जहाँ हम हमेशा कोने वाली बेंच पर बैठते थे। मैं साढ़े चार बजे ही पहुँच गया। पुरानी आदत। वो हमेशा कहती थी, तुम पहले आकर इंतजार करने का नाटक करते हो।
मैंने दो चाय बोलीं, फिर याद आया, वो अब अदरक वाली नहीं पीती, उसे एसिडिटी हो जाती है। मैंने एक वापस करा दी।
वो पांच बजकर सात मिनट पर आई। नीला सूट पहना था, वही जो मैंने पहली बार कहा था कि तुम पर अच्छा लगता है। बाल खुले थे, आज क्लिप नहीं लगाई थी। हाथ में वही छोटा काला पर्स। स्कूटी स्टैंड पर लगाई और सीधे आकर बैठ गई।
कुछ देर हम बस चाय की भाप देखते रहे। दुकान वाले ने भी शायद समझ लिया था, आज उसने गाना धीमा कर दिया था।
फिर उसने बैग से एक पन्नी निकाली। मेरी ग्रे हुडी। जो दो सर्दियों से उसके पास थी। उसने धीरे से कहा, धुलवा दी है। मैं हँसने की कोशिश करते हुए बोला, अब ठंड में तुम क्या पहनोगी। वो नहीं मुस्कुराई।
मैंने जेब से एक छोटा लिफाफा निकाला। उसमें उसके हाथ के लिखे हुए पुराने नोट्स थे, वृंदावन जाते समय का बस का टिकट था, और एक कागज जिस पर उसने पहली बार दिल बनाकर मेरा नाम लिखा था। मैंने कहा, ये तुम्हारे पास ही रहने चाहिए।
उसने लिफाफा लिया, खोला नहीं, बस पर्स में रख लिया।
बातें बहुत साधारण थीं। उसने पूछा, तुम खाना समय पर खा रहे हो। मैंने पूछा, तुम्हारी नींद अब ठीक है। उसने बताया, मम्मी को आजकल बीपी रहता है। मैंने बताया, मैंने कोचिंग छोड़ दी है, स्कूल में परमानेंट की बात चल रही है।
हम एक दूसरे को अपडेट दे रहे थे, जैसे दो पुराने दोस्त। बीच बीच में चुप्पी आ जाती, और वही चुप्पी सबसे ज्यादा बोलती थी।
फिर उसने कहा, मुझे गिल्ट नहीं चाहिए, और तुम्हें भी नहीं देना चाहती। हम बुरे नहीं हैं, बस हमारी टाइमिंग गलत है।
मैंने सिर हिलाया। अंदर कुछ टूट रहा था, पर आंखें सूखी थीं। शायद इसलिए कि पिछली कई रातों में रोना पूरा हो चुका था।
सवा छह बजे उसने घड़ी देखी। बोली, निकलना होगा, घर पर मार्केट का बोलकर आई हूँ। हम दोनों उठे।
जाते जाते वो रुकी। फिर बिना कुछ कहे बहुत कसकर गले लग गई। वो फिल्मों वाला लंबा सीन नहीं था। बस पांच छह सेकंड। उसकी चुनरी मेरे चेहरे पर आई, वही हल्की शैम्पू की खुशबू, उसकी तेज साँसें। मैंने उसकी पीठ पर हाथ रखा, जैसे हमेशा रखता था जब वो रोती थी। पर आज वो रोई नहीं।
फिर वो पीछे हटी, मेरी शर्ट का कॉलर ठीक किया, जैसे हर बार करती थी। बोली, अपना ध्यान रखना। मैंने कहा, तुम भी।
वो स्कूटी पर बैठी, एक बार मुड़ी, हल्का सा हाथ हिलाया, और चली गई। मैं वहीं खड़ा रहा जब तक मोड़ पर उसकी लाइट दिखती रही। फिर वो भीड़ में गायब हो गई।
मैं वापस बेंच पर बैठ गया। चाय ठंडी हो चुकी थी। दुकान वाले ने पूछा, भैया और लाऊं। मैंने मना कर दिया।
उस रात मैंने उसका नंबर डिलीट नहीं किया। चैट आर्काइव कर दी। फोटो भी नहीं हटाईं। लोग कहते हैं, मूव ऑन करना है तो सब मिटा दो। मुझे लगता है, कुछ चीजें मिटाने से नहीं, संभाल कर रखने से हल्की होती हैं।
अगले हफ्ते उसकी सगाई की फोटो एक कॉमन फ्रेंड के स्टेटस पर दिखी। लाल जोड़ा था, नीला नहीं। वो मुस्कुरा रही थी। आंखें वही थीं। मैंने देखा, लाइक नहीं किया, फोन रख दिया।
आखिरी मुलाकात में सबसे अजीब बात यही होती है। वो नाटकीय नहीं होती। कोई बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं बजता। बस एक साधारण सी शाम होती है, एक ठंडी चाय होती है, और दो लोग होते हैं जो जानते हैं कि अब इसके बाद हम नहीं कहेंगे।
कभी कभी मैं अब भी उस खोखे पर जाता हूँ। वही कोने वाली बेंच खाली मिल जाए तो बैठ जाता हूँ। अब वहां नया लड़का चाय बनाता है। पूछता है, अदरक डाल दूं। मैं कहता हूँ, नहीं।
लोग पूछते हैं, भूल गए। मैं कहता हूँ, नहीं। भूलना होता तो मेहनत करनी पड़ती। याद रखना तो अपने आप हो रहा है।
आखिरी मुलाकात अंत नहीं थी। वो सबूत थी कि हमने सच में मोहब्बत की थी। बिना किसी को दुश्मन बनाए, बिना तमाशा किए, बिना गाली गलौज। हमने हाथ पकड़ा था, और जब वक्त आया तो वही हाथ छोड़ भी दिया। क्योंकि पकड़ कर रखना प्यार होता है, जकड़ कर रखना जिद।
और अगर तुम ये पढ़ रहे हो और तुम्हारे सीने में कहीं हल्का सा दर्द उठ रहा है, तो शायद तुम्हारी भी कोई पांच बजे वाली शाम रही होगी। कोई नीला सूट, कोई लौटाई हुई हुडी, कोई अधूरी चाय।
तुम अकेले नहीं हो। हम सबने किसी न किसी को आखिरी बार देखा है, और फिर भी जी रहे हैं। उसी याद के साथ, जो अब चुभती नहीं, बस साथ चलती है।