"तन्हाई का सफर"
यह तन्हाई भी कभी-कभी साथ निभाती है,
जब सारी भीड़ से दिल ऊब जाता है।
कोई सुनने वाला ना हो, तो ग़म नहीं,
क्योंकि रूह को अंदर ही सुकून मिल जाता है।
कितने रिश्ते बनाए, कितने फिर टूट गए,
हर ख्वाब आँखों में अधूरे ही छूट गए।
बस एक सवाल था हर दफ़ा ज़िंदगी से,
क्यूँ अंधेरे में सारे दीप रूठ गए?
मगर इस खामोशी में एक आवाज़ है,
जो कहती है, "तू किसी का मोहताज नहीं है।"
तेरी ताक़त तुझमें ही छिपी हुई है,
यह अंदर का लौह ही तेरा राज है।
जो गिरता है, वही फिर उठना सीखता है,
हर ठोकर से एक नया रास्ता दिखता है।
अब नहीं ज़रूरत किसी के सहारे की,
क्योंकि मेरा वजूद खुद से खुश दिखना सीखता है।
तो चले हैं अकेले, नई राह बनाने को,
अपने टूटे हुए सपनों को सजाने को।
यह तन्हाई अब मेरी ताक़त बन गई है,
जो मुझे मंज़िल तक ले जाएगी, फिर से जगाने को।